सेवानिवृत्ति( Retirement): अंत नहीं, एक नया आयाम
सेवानिवृत्ति: अंत नहीं, एक नया आयाम – ओशो की दृष्टि में वृद्ध जीवन १. पारंपरिक सेवानिवृत्ति की भ्रमित अवधारणा समाज ने हमारे मन में सेवानिवृत्ति की एक बड़ी ही विचलित कर देने वाली छवि गढ़ी है। यह कुछ ऐसा है जैसे जीवन के खेल का अंत हो गया, और अब तुम "कबाड़खाना" हो, किसी काम के नहीं। यह सोच ही अपने आप में एक मनोवैज्ञानिक कारागार है, जहां व्यक्ति को यह अहसास कराया जाता है कि उसकी उपयोगिता खत्म हो गई है। यह सिर्फ शारीरिक शक्ति का हास नहीं, बल्कि एक गहरे मनोवैज्ञानिक घाव को जन्म देता है – जीवन शक्ति में कमी, उत्साह का क्षय, और अक्सर अवसाद की ओर धकेलना। समाज की इस भ्रामक धारणा के कारण, कई लोग अपने जीवन के सबसे अनुभवी और ज्ञानपूर्ण चरण को बोझ समझने लगते हैं। मनोवैज्ञानिकों का यह कहना कि जब कोई व्यक्ति सेवानिवृत्त होता है, तो वह उन सभी वर्षों को खो देता है जो वह काम करते हुए जी सकता था, इस त्रासदी को और गहरा करता है। यह उस बहुमूल्य समय को एक खोया हुआ अध्याय बना देता है, जबकि इसे एक नए अध्याय की शुरुआत होना चाहिए। २. ओशो का 'संन्यास' – क्षण-प्रतिक्षण की सेवानिवृत्ति ओशो हमें से...