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मैं मृत्यु सिखाता हूँ

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  ओशो-प्रेरित चिंतन जीवन और मृत्यु के शाश्वत सत्य पर एक आध्यात्मिक यात्रा ओशो की अद्भुत पुस्तक "मैं मृत्यु सिखाता हूँ": जीवन के सबसे बड़े रहस्य का अनावरण जीवन का सबसे बड़ा सत्य मृत्यु है, फिर भी हम इससे भागते हैं, इसे नज़रअंदाज़ करते हैं। ओशो की अद्भुत पुस्तक "मैं मृत्यु सिखाता हूँ" इस सार्वभौमिक भ्रम को तोड़ती है और हमें जीवन के इस परम रहस्य का सामना करने का साहस देती है। यह केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि अस्तित्व के गहनतम आयामों में एक यात्रा है, जो हमें सिखाती है कि मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि जीवन का एक अनवरत नृत्य है। मृत्यु की पारंपरिक अवधारणा को चुनौती हमारा समाज मृत्यु को एक भयावह विराम, एक त्रासदी, हर चीज़ का अंत मानता है। यह एक ऐसी वर्जना है जिसे हम चर्चा नहीं करते, जिसका सामना नहीं करते। बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि मृत्यु डरावनी है, दूर रखने वाली है। इस सामूहिक अज्ञानता और भय के कारण, हम न केवल मृत्यु से डरते हैं, बल्कि जीवन से भी पूरी तरह से नहीं जी पाते। ओशो इस संकीर्ण दृष्टिकोण को चुनौती देते हैं। वे कहते हैं कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि गहन समझ, रूपांतर...

माया का महत्व

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माया का महत्व: ओशो की दृष्टि में एक गहन अन्वेषण 1. प्रस्तावना: माया - पारंपरिक धारणाओं से परे ओशो का दृष्टिकोण मनुष्य का जीवन एक गहन पहेली है, और इस पहेली के केंद्र में है 'माया' - एक ऐसा शब्द जिसे अक्सर गलत समझा गया है, और जिसकी गहराई को ओशो ने अपनी अनूठी अंतर्दृष्टि से उद्घाटित किया है। पारंपरिक धारणाओं में माया को केवल एक दार्शनिक सिद्धांत या बाहरी दुनिया का भ्रम मान लिया जाता है, लेकिन ओशो के लिए यह कहीं अधिक गहरा, कहीं अधिक व्यक्तिगत है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि एक गहरी मनोवैज्ञानिक अवस्था है, एक भीतरी नींद है। यह सत्य और मुक्ति के मार्ग में केंद्रीय भूमिका निभाती है, क्योंकि जब तक हम इस माया के जाल को नहीं समझते, तब तक हम अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जान सकते। यह अचेतनता और आत्म-छल का वह विराट जाल है जो हमें स्वयं से, अस्तित्व से और परम सत्य से दूर रखता है। 2. माया: एक विराट स्वप्न और अचेतनता की अवस्था ओशो के अनुसार, माया का सबसे सटीक अर्थ है 'भीतर सो जाना' या जीवन को स्वप्नवत जीना। कल्पना कीजिए, आप जागृत अवस्था में हैं, लेकिन आपका मन कहीं और भटक रहा है, ...

सेवानिवृत्ति( Retirement): अंत नहीं, एक नया आयाम

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  सेवानिवृत्ति: अंत नहीं, एक नया आयाम – ओशो की दृष्टि में वृद्ध जीवन १. पारंपरिक सेवानिवृत्ति की भ्रमित अवधारणा समाज ने हमारे मन में सेवानिवृत्ति की एक बड़ी ही विचलित कर देने वाली छवि गढ़ी है। यह कुछ ऐसा है जैसे जीवन के खेल का अंत हो गया, और अब तुम "कबाड़खाना" हो, किसी काम के नहीं। यह सोच ही अपने आप में एक मनोवैज्ञानिक कारागार है, जहां व्यक्ति को यह अहसास कराया जाता है कि उसकी उपयोगिता खत्म हो गई है। यह सिर्फ शारीरिक शक्ति का हास नहीं, बल्कि एक गहरे मनोवैज्ञानिक घाव को जन्म देता है – जीवन शक्ति में कमी, उत्साह का क्षय, और अक्सर अवसाद की ओर धकेलना। समाज की इस भ्रामक धारणा के कारण, कई लोग अपने जीवन के सबसे अनुभवी और ज्ञानपूर्ण चरण को बोझ समझने लगते हैं। मनोवैज्ञानिकों का यह कहना कि जब कोई व्यक्ति सेवानिवृत्त होता है, तो वह उन सभी वर्षों को खो देता है जो वह काम करते हुए जी सकता था, इस त्रासदी को और गहरा करता है। यह उस बहुमूल्य समय को एक खोया हुआ अध्याय बना देता है, जबकि इसे एक नए अध्याय की शुरुआत होना चाहिए। २. ओशो का 'संन्यास' – क्षण-प्रतिक्षण की सेवानिवृत्ति ओशो हमें से...